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सूडान: युद्ध के 1000 दिन और शांति की तलाश

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Sudan War: 1000 Days of Conflict and the Search for Peace | Analysis by Ravi Kumar Manjhi 1000 दिनों से अधिक समय से सूडान में बंदूकें बोल रही हैं और इस शोर में एक पूरे समाज की आवाज़ दब गई है। 15 अप्रैल 2023 को शुरू हुआ यह संघर्ष अब केवल सैन्य टकराव नहीं रह गया , बल्कि एक ऐसी मानवीय त्रासदी बन चुका है जिसमें हजारों जानें जा चुकी हैं और लाखों लोग अपने ही देश में विस्थापित हो चुके हैं। ऐसे समय में युद्धविराम की मांग सिर्फ एक राजनीतिक अपील नहीं , बल्कि एक थके हुए समाज की ज़रूरत बन चुकी है। संकट की जड़ें सूडान की मौजूदा स्थिति को समझने के लिये उसके अतीत पर नज़र डालनी होगी। तीन दशकों तक चला दमनकारी शासन , जिसने सत्ता बनाए रखने के लिये हिंसा और विभाजन को हथियार बनाया , देश को भीतर से कमजोर कर चुका था। दारफुर और नूबा पर्वत जैसे क्षेत्रों में हुई घटनाएँ इस विभाजन की गहराई को दिखाती हैं। 2019 में जब जनता सड़कों पर उतरी और उमर अल-बशीर की सत्ता का अंत हुआ , तब एक नई शुरुआत की उम्मीद जगी थी। लाखों लोग एक साथ खड़े हुए यह केवल विरोध नहीं , बल्कि बदलाव की सामूहिक आकांक्षा थी लेकिन यही उम्मीद जल्...

WTO में IFD समझौते पर भारत का विरोध: निवेश सुविधा बनाम नीतिगत स्वायत्तता

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Why India Opposes IFD Agreement in WTO? Full Analysis by Ravi Kumar Manjhi विश्व व्यापार संगठन (WTO) में प्रस्तावित विकास के लिये निवेश सुविधा (Investment Facilitation for Development – IFD) समझौता को लेकर भारत ने स्पष्ट असहमति जताई है। जहाँ कई देश इसे निवेश को सरल और आकर्षक बनाने की दिशा में एक सकारात्मक कदम मान रहे हैं, वहीं भारत इसे अपने नीतिगत अधिकारों और बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था के लिये चुनौती के रूप में देखता है। IFD पहल की शुरुआत वर्ष 2017 में चीन के नेतृत्व में विकासशील और अल्प विकसित देशों के एक समूह द्वारा की गई थी। इसका उद्देश्य निवेश प्रक्रियाओं को आसान बनाना, नौकरशाही अड़चनों को कम करना और व्यापार संचालन को अधिक सुगम बनाना है। इस समझौते को बहुपक्षीय रूप में प्रस्तावित किया गया है, जो केवल उन विश्व व्यापार संगठन सदस्यों पर लागू होगा जो इसे स्वेच्छा से स्वीकार करेंगे। इसके समर्थकों का दावा है कि इसमें बाजार पहुँच, निवेश संरक्षण, निवेशक राज्य विवाद समाधान (ISDS) और सरकारी खरीद जैसे संवेदनशील मुद्दों को शामिल नहीं किया गया है। भारत की प्रमुख आपत्तियाँ इस समझौते की प्रकृति ...

ढाका की सियासत और भारत–बांग्लादेश रिश्तों का टर्निंग पॉइंट

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India Bangladesh relations by Ravi Kumar Manjhi भारत और बांग्लादेश के संबंध केवल दो पड़ोसी देशों के रिश्ते नहीं हैं, बल्कि इतिहास, संस्कृति और साझा हितों से गहराई से जुड़े हुए हैं। 1971 के मुक्ति संग्राम के बाद से भारत ने बांग्लादेश के साथ एक भरोसेमंद साझेदार की भूमिका निभाई है। सीमा विवादों का समाधान, व्यापार में वृद्धि, ऊर्जा सहयोग और कनेक्टिविटी परियोजनाएँ इस रिश्ते की मजबूती का प्रमाण रही हैं। लेकिन हाल के महीनों में ढाका में हुए राजनीतिक घटनाक्रमों ने इन संबंधों के सामने नई चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं। अगस्त 2024 में शेख हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग सरकार के पतन को बांग्लादेश की राजनीति में एक बड़े मोड़ के रूप में देखा जा रहा है। यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि उस राजनीतिक स्थिरता का अंत भी था, जिस पर भारत–बांग्लादेश संबंध लंबे समय से टिके हुए थे। इस बदलाव के बाद राष्ट्रीय नागरिक पार्टी जैसे नए राजनीतिक दल उभरे हैं, जिनका नेतृत्व उन छात्र कार्यकर्ताओं के हाथ में है जो सरकार-विरोधी आंदोलनों में सक्रिय थे। इसके साथ ही जमात-ए-इस्लामी जैसी इस्लामी राजनीतिक शक्तियों की वापसी भी ह...

बहुधुरी कूटनीति: बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत का संतुलित उभार

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 India–EFTA FTA & the $100 Billion Investment Commitment by Ravi Kumar Manjhi. भारत ने यूरोपीय फ़्री ट्रेड एसोसिएशन (EFTA) के साथ एक ऐतिहासिक Free Trade Agreement (FTA) पर हस्ताक्षर किए हैं। इस समझौते के तहत EFTA देशों ने भारत में अगले 15 वर्षों में 100 बिलियन डॉलर FDI का लक्ष्य तय किया है। यह करार भारत के उभरते ऊर्जा, विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों के लिए एक नई दिशा खोलता है। FTA का मतलब  What is an FTA (Free Trade Agreement)? FTA, यानी Free Trade Agreement, दो देशों के बीच ऐसा समझौता है जिसमें व्यापार पर लगने वाली रुकावटें, जैसे टैरिफ (शुल्क), कोटा, गैर-शुल्क बाधाएँ (Non-Tariff Barriers) कम या समाप्त कर दी जाती हैं। EFTA क्या है? What is EFTA? EFTA चार देशों का समूह है: स्विट्ज़रलैंड, नॉर्वे, आइसलैंड, लिक्टेनस्टीन ये यूरोपीय संघ का हिस्सा नहीं हैं, लेकिन विश्व व्यापार में अत्यधिक प्रभावशाली अर्थव्यवस्थाएँ हैं। 100 बिलियन डॉलर निवेश लक्ष्य  $100 Billion Investment Commitment TEPA के तहत EFTA देशों ने भारत में पहले 10 वर्षों में 50 बिलियन डॉलर, अगले 5 वर्षों में 50 बिलि...

2025 का उभरता वैश्विक बदलाव: AI की बढ़ती ऊर्जा ज़रूरतें और हमारे सामने खड़े नए सवाल

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AI's growing energy needs and the new challenges we face by Ravi Kumar Manjhi पिछले कुछ वर्षों में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस दुनिया की सबसे प्रभावशाली तकनीक बनकर उभरी है। चैटबॉट्स, स्मार्ट असिस्टेंट और अनुवाद उपकरण ये सभी हमारे दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बनते जा रहे हैं। लेकिन इसी क्रांति का एक ऐसा पहलू है, जिसकी चर्चा अब तक उतनी नहीं हुई। वह छिपा हुआ पहलू है AI मॉडल्स और डेटा सेंटर्स की तेजी से बढ़ती ऊर्जा खपत, जिसने 2025 में वैश्विक स्तर पर नई बहस को जन्म दिया है। जैसे-जैसे AI मॉडल अधिक शक्तिशाली होते जा रहे हैं, उनकी ऊर्जा माँग भी उसी गति से बढ़ती जा रही है। यही कारण है कि ऊर्जा विशेषज्ञ, नीति निर्माता और तकनीकी शोधकर्ता इस विषय पर गंभीरता से चर्चा कर रहे हैं। जानिए वैज्ञानिक आँकड़े क्या कह रहे हैं आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की ऊर्जा भूख को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई रिपोर्टें चेतावनी दे रही हैं। International Energy Agency की 2025 रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में विश्व के डेटा सेंटर्स की कुल बिजली खपत लगभग 415 TWh थी। IEA का अनुमान है कि 2030 तक यह खपत दोगुनी होकर 940 से 1050 TWh के ...

नेबरहुड फर्स्ट: नारे से आगे बढ़ने का समय

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  The instability spread from Nepal to Bangladesh is not only their problem but is also a big test for India. By Ravi Kumar Manjhi. हाल के महीनों में नेपाल और बांग्लादेश में जिस तरह राजनीतिक उथल-पुथल देखने को मिली है, उसने पूरे दक्षिण एशिया को झकझोर दिया है। निराश और अवसरहीन होते जा रहे शिक्षित युवा, जो डिजिटल रूप से दुनिया से जुड़े और राजनीतिक रूप से अधिक जागरूक हैं, अब अपनी ही व्यवस्था से मोहभंग महसूस कर रहे हैं। इन देशों की लोकतांत्रिक संरचना धीरे-धीरे कुलीनतंत्र में तब्दील होती जा रही है, जहाँ सत्ता का इस्तेमाल आम जनता की आकांक्षाओं की बजाय राजनीतिक अभिजात वर्ग के हित साधन में हो रहा है। भारत की “नेबरहुड फर्स्ट” नीति, जो पड़ोस में स्थिरता और सहयोग को बढ़ावा देने का संकल्प लेती है, इन हालात में और भी प्रासंगिक हो उठी है। परंतु, अवसरवादी राजनीतिक संलग्नताओं और सीमित कूटनीतिक संसाधनों के चलते इस नीति के नतीजे अपेक्षा के अनुसार नहीं रहे। उपमहाद्वीप की साझा चुनौतियाँ इस ओर इशारा करती हैं कि द्विपक्षीय रिश्तों से आगे बढ़कर अब एक समग्र क्षेत्रीय दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। पड़ोसी...

भारत-जापान रणनीतिक साझेदारी: एक नया आयाम

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India-Japan Strategic Partnership: A New Dimension by Ravi Kumar Manjhi भारत और जापान के बीच विशेष रणनीतिक एवं वैश्विक साझेदारी (Special Strategic and Global Partnership) आज एक नए आयाम पर पहुँच चुकी है। दोनों देश न केवल ऐतिहासिक रूप से जुड़े हुए हैं, बल्कि आधुनिक समय में आर्थिक, तकनीकी, रक्षा और सांस्कृतिक क्षेत्रों में भी एक-दूसरे के मज़बूत सहयोगी बन चुके हैं। ऐतिहासिक संबंध भारत और जापान के बीच संबंध कोई नए नहीं हैं। बौद्ध धर्म ने दोनों देशों को एक गहरे सांस्कृतिक धागे में बाँधा है। स्वतंत्रता के बाद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा जापान को हाथी भेंट करना इन संबंधों का प्रतीक रहा। वर्ष 1952 में शांति संधि पर हस्ताक्षर कर भारत ने जापान के साथ औपचारिक राजनयिक संबंध स्थापित किए। रणनीतिक साझेदारी का विकास वर्ष 2000: वैश्विक साझेदारी वर्ष 2006: रणनीतिक एवं वैश्विक साझेदारी वर्ष 2014: विशेष रणनीतिक एवं वैश्विक साझेदारी वर्ष 2015: ‘भारत-जापान विज़न 2025’ इन समझौतों ने दोनों देशों के रिश्तों को लगातार मज़बूत किया है। प्रमुख क्षेत्र 1. रक्षा एवं सुरक्षा  : संयुक्त सैन्य अभ्यास, रक्षा प...